क्या आपने कभी विटामिन की गोली खाई है? दुनिया में हर दिन करोड़ों लोग विटामिन की गोलियां खाते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि आप भी उनमें से एक हैं.
बीते सौ साल में दुनिया बहुत बदल गई है. विटामिन की इन गोलियों ने बदलती हुई दुनिया को देखा है. 100 साल के भीतर विटामिन की ये गोलियां अरबों डॉलर का बाज़ार बन गई हैं.
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए विटामिन का बड़ा योगदान माना गया है. लेकिन क्या उसके लिए हर व्यक्ति को विटामिन की गोलियां खाना ज़रूरी है.
विटामिन की गोलियां कब और कैसे, करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों में शामिल हो गईं ? इस सवाल की पड़ताल बड़ी रोचक है.
100 साल पहले विटामिन के बारे में किसी ने सुना तक नहीं था, लेकिन अब दुनिया भर में हर उम्र के लोग फूड-सप्लीमेंट के तौर पर विटामिन की गोलियां खा रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के लिए काम करने वाली डॉक्टर लीसा रोजर्स के मुताबिक 17वीं शताब्दी में वैज्ञानिकों को पहली बार अहसास हुआ कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा के अलावा खाने-पीने में कुछ तो ऐसा है जो अच्छी सेहत के लिए बेहद ज़रूरी है.
वो कहती हैं, “उस दौर में वैज्ञानिकों ने ये नोटिस किया कि जो नाविक लंबी समुद्री यात्राओं पर जाते हैं, उन्हें खाने के लिए ताज़े फल-सब्ज़ियाँ नहीं मिल पाते. इसकी वजह से उनके खान-पान में कमी रह जाती है जिसका असर सेहत पर पड़ता है.”
लेकिन वैज्ञानिक 20वीं सदी की शुरुआत में ही वाइटल-अमीन्स को समझ पाए, जिन्हें हम आज वाइटामिन या विटामिन के नाम से जानते हैं.
हमारे शरीर को 13 तरह के विटामिनों की ज़रूरत होती है. ये हैं विटामिन ए,सी,डी,ई और के.
अल्फ़ाबेट के हिसाब से देखें तो विटामिन ए और सी के बीच में है विटामिन बी, जो आठ तरह के होते हैं. इस तरह कुल विटामिन हुए 13.
हर विटामिन दूसरे से अलग है और हर अच्छी सेहत के लिए सही मात्रा में बेहद ज़रूरी है.
इनमें से विटामिन डी को हमारा शरीर सूर्य के प्रकाश में बना सकता है, लेकिन बाक़ी विटामिन हमें भोजन से ही मिलते हैं.
डॉक्टर लीसा रोजर्स के मुताबिक, “दुनिया में अभी भी दो अरब से ज्यादा लोग विटामिन या मिनरल्स की कमी से पीड़ित हैं. इनमें से ज़्यादातर, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में रहते हैं. बच्चों के मामले में विटामिन की कमी जानलेवा साबित होती है, क्योंकि जब वो बीमार पड़ते हैं या उन्हें किसी तरह का संक्रमण होता है, तो भूख पहले ही कम हो चुकी होती है और यदि वो कुछ खाते भी हैं, तब शरीर पोषक तत्वों को ग्रहण ही नहीं कर पाता.”
विज्ञान की इतनी तरक्की के बावजूद विटामिंस के बारे में अभी बहुत कुछ जानना बाकी है. ऊपर से हमारी खान-पान की बिगड़ती आदतों ने मुश्किल और बढ़ा दी है.
डॉक्टर लीसा रोजर्स का मानना है, “ज़्यादातर लोग यही सोचकर विटामिन की गोलियां खाते हैं कि इससे उन्हें फ़ायदा होगा, मानो इन गोलियों से कोई जादू हो जाएगा, लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि विटामिन तो शरीर को तभी मिलते हैं जब हम संतुलित खाना नियमित रूप से खाते हैं. सिर्फ़ गोली लेने से बात नहीं बनती. प्रेग्नेंसी या बुढ़ापा जैसी ख़ास स्थितियों में विटामिन की गोलियां लेना अलग बात है.”
लेकिन फिर भी ऐसे लाखों लोग हैं जो सिर्फ सप्लीमेंट के तौर पर विटामिन की गोलियां खाते हैं. क्या स्वस्थ लोगों के लिए विटामिन के सप्लीमेंट लेना ज़रूरी है?
साइंस जर्नलिस्ट कैथरीन प्राइस ने विटामिनों के बारे में काफ़ी अध्ययन किया है. उनका मानना है कि 20 शताब्दी की शुरुआत में विटामिन शब्द को ईजाद करने वाले पोलैंड के बायोकेमिस्ट कैशेमेए फंक को मार्केटिंग अवॉर्ड मिलना चाहिए.
वो कहती हैं, “इस दिशा में काम कर रहे अन्य वैज्ञानिकों ने इसे फूड-हॉर्मोन या फूड-एक्सेसरी फैक्टर जैसे नाम दिए. मैं अक्सर ये बात मज़ाक में कह देती हूं कि फूड-एक्सेसरी फैक्टर जैसा नाम वो कमाल नहीं दिखा पाता जो विटामिन ने दिखाया. कोई अपने बच्चे को हर दिन फूड-एक्सेसरी फैक्टर देना पंसद नहीं करता.”
कैथरीन प्राइस का दावा है कि जो लोग उस दौर में पैसा बनाने के बारे में सोच रहे थे, विटामिन के ‘नए कॉन्सेप्ट’ से उनकी लॉटरी लग गई.
कैथरीन प्राइस का मानना है, “फूड प्रॉडक्ट की मार्केटिंग करने वालों को लगा कि ये तो गज़ब की चीज़ है, क्योंकि ख़ुद वैज्ञानिक कह रहे थे कि खाने में कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो किसी को दिखाई नहीं देतीं, जिनका अपना कोई स्वाद नहीं होता. ये मात्रा में बहुत कम होते हैं, लेकिन इनकी कमी से होने वाली बीमारियां आपकी जान भी ले सकती हैं.”






