ऐप-पोर्टल पर अनिवार्य पंजीयन, वीडियो और तत्काल रिपोर्टिंग के निर्देशों पर उठे सवाल
(डॉ. सुनील पलस्कर द्वारा)
अंबिकापुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों को लगातार गैर-शैक्षणिक, ऑनलाइन पंजीयन और रिपोर्टिंग संबंधी कार्यों में लगाए जाने से विद्यालयों में नियमित पढ़ाई प्रभावित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। शिक्षकों का कहना है कि उनका प्रमुख दायित्व बच्चों को पढ़ाना है, लेकिन उच्च कार्यालयों से मिलने वाले समयबद्ध निर्देशों और तत्काल जानकारी भेजने के दबाव में उनका काफी समय मोबाइल ऐप एवं पोर्टलों पर बीत रहा है।
शिक्षकों के अनुसार, यू-डाइस पोर्टल पर विद्यार्थियों, शिक्षकों और विद्यालयों की जानकारी दर्ज करना शिक्षा व्यवस्था से सीधे संबंधित आवश्यक कार्य है। लेकिन इसके अतिरिक्त कई अभियान, आयोजन और ऐप आधारित गतिविधियों का काम भी शिक्षकों को सौंपा जा रहा है।
हाल में प्रशस्त ऐप को लेकर जारी निर्देश में कहा गया कि बार-बार सूचना देने के बाद भी शिक्षकों के पंजीयन की स्थिति “अत्यंत निराशाजनक” है। संकुल समन्वयकों को प्रत्येक संस्था से व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर सभी शिक्षकों का पंजीयन पूरा कराने के निर्देश दिए गए।
मांगी गई जानकारी में संकुल अंतर्गत शिक्षकों की कुल संख्या, प्रशस्त ऐप में पंजीकृत शिक्षकों की संख्या और वीडियो देखने वाले शिक्षकों का अलग-अलग विवरण शामिल था। एक से लेकर दस वीडियो तक देखने वाले शिक्षकों की संख्या भी निर्धारित प्रारूप में भेजने को कहा गया।
शिक्षकों का कहना है कि किसी ऐप या पोर्टल पर ऐसी गतिविधियों में भागीदारी स्वेच्छा और रुचि के आधार पर होनी चाहिए, दबाव या चेतावनी देकर नहीं। यदि पंजीयन अथवा वीडियो देखना शासन की अनिवार्य योजना का हिस्सा है, तो इसका स्पष्ट आदेश, उद्देश्य, समय और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। केवल ग्रुप संदेश भेजकर अत्यंत कम समय में शत-प्रतिशत लक्ष्य पूरा करने का दबाव उचित नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा निःशुल्क पाठ्यपुस्तकों की शत-प्रतिशत स्कैनिंग, स्वच्छ एवं हरित विद्यालय ऐप पर पंजीयन, मिशन लाइफ इको क्लब तथा ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की ऑनलाइन एंट्री भी समय-सीमा में पूरी कराई जा रही है। कृमि मुक्ति दिवस प्रशिक्षण में प्राचार्यों और प्रधान पाठकों की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।राज्य स्तरीय खेल प्रतियोगिता—“खेलों का महाकुंभ”—की तैयारियों एवं भागीदारी संबंधी जिम्मेदारियां भी शिक्षकों को दिए जाने की बात सामने आई है। राजनीतिक पदाधिकारियों के आगमन पर स्वागत कार्यक्रमों में शिक्षकों और विद्यार्थियों को झंडे लेकर उपस्थित कराने की शिकायतें भी की गई हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर इंटरनेट और तकनीकी समस्याओं के कारण ऑनलाइन कार्यों में कई घंटे लग जाते हैं। कई बार शिक्षकों को अध्यापन छोड़कर संकुल कार्यालय या प्रशिक्षण में उपस्थित होना पड़ता है। इससे कक्षाएं बाधित होती हैं और विद्यार्थियों की पढ़ाई का नुकसान होता है।
कुछ निजी विद्यालय संचालकों ने समय पर ऑनलाइन कार्य पूरा नहीं करने पर मान्यता संबंधी कार्रवाई की चेतावनी मिलने की शिकायत भी की है।
शिक्षकों की मांग है कि विद्यालयों में डाटा एंट्री ऑपरेटर अथवा प्रशासनिक कर्मचारी नियुक्त किए जाएं। शासन को स्पष्ट नीति बनाकर शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना चाहिए, ताकि वे बच्चों की शिक्षा और भविष्य पर पूरा ध्यान दे सकें।






